निर्भया दिवस से निर्भय दिवस तक


 बहुत ही दर्दनाक रहा है 16 दिसंबर 2012 से लेकर 20 मार्च 2020 की पूर्व मध्य रात्रि तक का सफर घटना ऐसी कि दिल दहल गया,  दृश्य ऐसे उभरे कि आँख अभी तक नम हैं, करतूत ऐसी जो घिनौनी से भी घिनौनी या कुत्सित से भी कुत्सित थी और परिणाम ऐसा कि साँस थम गयी, एक चीख थी जो सुनी न गयी, एक आह थी जो दब कर रह गयी, एक रात थी जो उस रात हैवानियत लेकर आयी थी उसके बाद जन समूह का आक्रोश इतना कि न्याय के लिए गुहार लगी, संयम और संघर्ष इतना कि उसके लिए 7साल, 3 महीने, 4 दिन तक इंतजार किया l जब कभी भी कहीं न्याय की माँग उठती है तब जेहन में 1993 में  राजकुमार संतोषी के निर्देशन में बनी फिल्म दामिनी में अभिनेता सनी देओल द्वारा न्यायालय में दी गयी दलील की अनायास ही याद आ जाती है - ' तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख मिलती रही है लेकिन इंसाफ नहीं मिला मी लॉर्ड, मिली है सिर्फ तारीख़,......लोग अपना जमीन, जायदाद, बेचकर केस लड़ते हैं और ले जाते हैं तारीख़, औरत ने अपने गहने जेवर यहाँ तक मंगलसूत्र तक बेचे हैं और उन्हें भी मिली है तो सिर्फ़ तारीख़, महीनों सालों तक चक्कर काटते-काटते ख़ुद फरियादी बन जाते हैं तारीख़, उन्हें भी मिलती है तो सिर्फ तारीख...' तदुपरांत ही दामिनी को आखिर न्याय मिल ही जाता है, ठीक उसी प्रकार 16 दिसम्बर 2012 में दरिन्दों का शिकार हुई दामिनी कहिये अथवा निर्भया उसे भी आखिर तारीखों पर तारीख़े चलते अंत में न्याय मिल ही गया l दामिनी की माँ आशा और उसके पिताजी सहित अन्य एक बड़े जन समुदाय ने आखिर अंत तक संघर्ष कर यह विजय पायी है l हम सभी को याद हैं दामिनी की वह पीड़ा जो उसने घटना के14 दिनों के अंतराल में शरीर के लहु लुहान होने से लेकर, शरीर की 5 बार सर्जरी होने तक तथा अंत में जिंदगी की आखिरी जंग को लड़ते हुए   30 दिसंबर2012 को पीड़ा से कराहते हुए दम तोड़ देना, आज भी उस घटना की स्मृति दिल झकझोर देती है l
बहरहाल, 20 मार्च 2020 की सुबह कुछ सुखद परिणाम, और दामिनी के लिए इंसाफ की खबर लेकर आयी थी, जो निर्भया के दोषियों विनय, पवन, मुकेश, अक्षय की आखिरी सुबह थी, सुबह 5.30 बजे उन्हें फाँसी मुक़र्रर की गयी थी और निर्धारित समय पर ही पवन जल्लाद और न्यायायिक अधिकारी नेहा बंसल तथा अन्य अधिकारियों की मौजूदगी में तिहाड़ जेल की बैरक नंबर 3 में फाँसी की प्रक्रिया सम्पन्न की गयी l आश्चर्य की बात है दरिन्दों को आज भी अपने पाप का प्रायश्चित नहीं हुआ लेकिन वे अपनी मृत्यु को लेकर बहुत भयभीत थे, नेहा बंसल जी के समक्ष यह पहला दृश्य था और जल्लाद का भी इसलिए पवन के हाथ उन्हें मौत के घाट उतारते समय कुछ काँपे जरूर थे लेकिन दरिन्दों को सजा देने के लिए वह पूर्ण रूप से तैयार था क्योंकि उसका दिल काँपने के लिए तैयार नहीं था l ख़ैर याद हो निर्भया के 6 दोषी थे ,जिसमें से एक अपराधी ने आत्महत्या कर ली और दूसरे को उसकी पहचान छुपाकर सुधार गृह में भेज दिया गया है l आज उसके दोषियों को यथोचित सजा मिल चुकी है आज न केवल निर्भया अथवा उसके परिवार को न्याय नहीं मिला बल्कि देश के उस व्यापक जन समूह को न्याय मिला है जो इस संवेदना से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़कर संघर्ष कर रहे थे l जिसमें मीडिया, कानून व्यवस्था, न्याय व्यवस्था इत्यादि का उल्लेखनीय एवं प्रशंसनीय रहा है l हमें गर्व है संविधान पर जिसमें लोगों की आस्था अब और बढ़ेगी l लेकिन आज भी जेहन में बार बार एक सवाल उठता है कि इतनी बड़ी दरिंदगी का शिकार होने के बावजूद बेटी को न्याय में देरी क्यूँ मिली? यह प्रश्न महज मेरा नहीं है बल्कि हर एक नागरिक का है, क्या हमारी न्याय व्यवस्था इतनी अक्षम है वह शीघ्र निर्णय देने में थोड़ा सकुचाती है ? हम सभी जानते हैं कि संविधान का मूलमंत्र यह है कि भले कई दोषी मुक्त हो जाएं लेकिन किसी एक निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए l इस पंक्ति का प्रयोग यथोचित किया जा सकता है हमें इस बात पर कोई आपत्ति नहीं है, हम पूर्ण रूप से इसके पक्षधर हैं लेकिन इस पंक्ति का उपयोग अपराध युक्त जाँच पड़ताल पर होता है तब तक तो ठीक है वही इसके ठीक विपरीत किसी जघन्य अपराध में भी इस बात को बचाव के रूप में लिया जाये तब थोड़ा सा प्रश्न उठना और आपत्ति होना लाजिमी नहीं तो क्या है ? आज भी देश में कई मासूम बच्चियों की अथवा ज्ञात- अज्ञात निर्भयाओं का फैसला आपकी तरफ देख रहा है, उनकी आँखों में भी निर्भया की माँ आशा की तरह संघर्ष के बाद इंसाफ की उम्मीद लगी हुई है l हमें सहर्ष गर्व है कि आज न्याय व्यवस्था ने एक कीर्तिमान स्थापित करने का प्रयास किया है लेकिन आम आदमी होने के नाते एक अफसोस भी है वह यह है कि- ' जस्टिस  डिले  इज जस्टिस  डिनाइड  ' अर्थात देरी से मिला न्याय, न्याय नहीं होता l हम आशा करते हैं आज कि न्याय व्यवस्था अथवा कानून व्यवस्था में आंशिक अथवा अनिवार्य यथोचित परिवर्तन तो अवश्य किया जाना चाहिए जिससे लोगों की आस्था और दृण हो सके, सत्यमेव जयते की धारणा अनवरत रह सके , ताकि भविष्य में एक सुखद न्याय व्यवस्था जन्म ले सके ,तभी वास्तविक रूप में लगेगा कि आज न केवल निर्भया दिवस है बल्कि सभी के लिए निर्भय दिवस भी है... कुमार विश्वास के शब्दों में और मेरी और आप सभी की और से  निर्भया को याद करते हुए विजयी श्रंद्धांजलि-
तुमसे माफी नहीं माँगता चिरैया,
 बस हो सके तो अगले जन्म,
मेरी बिटिया बन कर मेरे आँगन में हुलसना बच्चे,
विधाता से छीनकर अपना सारा पुरुषार्थ लगा दूँगा तुम्हें भरोसा दिलाने में-
मर्द होने से पहले इंसान होता है असली पुरूष l

              किशोर कुमार शर्मा
शोधार्थी, हिंदी साहित्य

महाराजा सूरजमल ब्रज विश्विद्यालय, भरतपुर ( राजस्थान)

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