जिन पर लुटाते रहे तन, मन, धन हम, आज वही खर्च की पाई- पाई जोड़ लेते हैं



जिन पर लुटाते रहे तन, मन, धन हम,

आज  वही खर्च की पाई- पाई जोड़ लेते हैं

फिर भी निकल रही दिल से 

दुआ,

खुश रहो तुम हम यह घर छोड़ देते हैं।


किसी और के सहारे कोई

कैसे जिए,

जब अपने ही अपनों का साथ छोड़ देते हैं।



उंगली पकड़ जिन्हें चलना सिखाया था,

सवाल पूछने पर वही मुंह मोड़ लेते हैं।



एक एक निवाला बड़े प्यार से खिलाया जिन्हें,

आज एक एक रोटी का हिसाब पूछ लेते हैं।



लाड प्यार से जो बेल हमने 

जीवन भर सींची,

बिच्छुओ सा  हमसे व्यवहार कर देते हैं।



जिनको सुलाने में रातों की नींद छोड़ दी,

आज आंखों में आंसू दे रातों की नींद छीन लेते हैं।



मन में भरे पीड़ा अपार "साधना"

चलो आज यही कलम रोक देते हैं।



साधना मिश्रा विंध्य

लखनऊ उत्तर प्रदेश

Post a Comment

0 Comments